दोहा पंचक. . . . . मीत
दोहा पंचक. . . . . मीत
वक्त प्रतीक्षा में सजन, ऐसे हुआ व्यतीत ।
धड़कन रुकती सी लगे, रात न जाए बीत ।।
थोड़ी सी तकरार में, रुष्ट हुआ मन मीत ।
छोड़ो भी अब रूठना, रात रही है बीत ।।
तेरे वादे पर गई , उम्र हमारी रीत ।
राह निहारें कब तलक, रात रही है बीत ।।
शर्मीली सी हार है, शर्मीली सी जीत ।
कुछ तो समझो लाज का, मतलब मेरे मीत ।।
साँसों ने जब से सुना , साँसों का संगीत ।
जीवन छोटा रात का, लगता मेरे मीत ।।
सुशील सरना / 8-7-25