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8 Jul 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . . मीत

दोहा पंचक. . . . . मीत

वक्त प्रतीक्षा में सजन, ऐसे हुआ व्यतीत ।
धड़कन रुकती सी लगे, रात न जाए बीत ।।

थोड़ी सी तकरार में, रुष्ट हुआ मन मीत ।
छोड़ो भी अब रूठना, रात रही है बीत ।।

तेरे वादे पर गई , उम्र हमारी रीत ।
राह निहारें कब तलक, रात रही है बीत ।।

शर्मीली सी हार है, शर्मीली सी जीत ।
कुछ तो समझो लाज का, मतलब मेरे मीत ।।

साँसों ने जब से सुना , साँसों का संगीत ।
जीवन छोटा रात का, लगता मेरे मीत ।।

सुशील सरना / 8-7-25

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