कहती नहीं कहते हैं।
कहती नहीं कहते हैं।
कहने से गुमान हो जाता है।
बस लिख जाती हूं,
खामोशीयां,बैचेनियां,
तड़प,सपनें,ख़्वाहिशें,
चाहत,और एक स्वतंत्र
उड़ान में तलाश मंजिल
की, लिख जाती हूं।
पता है हमें कोई समझेगा
नहीं फिर भी लिख जाती हूॅं।
दर्द, प्यार, नफ़रत,अवहेलना,
सम्मान, धिक्कार,आदर,
इज्जत,इंतज़ार सब जो
कह सकती नहीं,
और कहकर गुमान
में कर सकती नहीं
बस लिख जाती हूॅं।
निर्मला सिन्हा निशा 💞