कोई ख़्वाब हैं वो
बहुत नजदीक है मगर फिर भी एक ख़्वाब है वो।
लगता है धड़क रहा है बन कर कोई राज है वो।।
नन्हें नन्हें कदमों से खीचता चूलबुला सा बच्चा जैसे कोई।
दौड़ी जाती सुध बुध खोये ऐसा बाबला ख़्वाब सा है वो।।
नींद में करबट लेती तकिया को बाँहों में भर लेती।
तो लगता आसमां पे टिमटिमाते तारों सा ख़्वाब है वो।।
पत्तों की आवाज़ कानों में जब आ कर तकराती।
लगता पत्तों पर ठहरी हुई ओस की बूँदों सा ख्वाब है वो।।
आहटो के बीच जब थक कर कोई रुक जाता।
उन हाँफती हुई सांसों सा सीढ़ियों पर चढ़ता ख़्वाब है वो।।
कश्ती सा डगमगाता तो कभी संभल कर चलता।
उस माँझी के विश्वास की पतवार सा ख़्वाब है वो।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”