आज फिर लगा की....
आज फिर लगा कि उसके कदमों की आहट हुई।
बिना शोर किया ही मैं दौड़ी और घर से बाहर हुई।।
अरे यह क्या कोई झूठ मुठ की आवाज थी भ्रम हुई।
मैं तो उसके इंतजार में खड़ी खड़ी बर्फ के समान हुई।।
खुले जो होंठ तो एक धीमी सी कहीं दूर आवाज हुई।
मैं हंस पड़ी और फिर संगीत की मीठी सी झंकार हुई।।
चांद ने बिखराई चांदनी सागर में लहरों की मधुर आवाज़ हुई।
मिलन की इस घड़ी में काली घटनाओं की चाँद पर रुसबाई हुई।।
दौलत के आगे फिर इक बार रिश्तों में बेवजह तकरार हुई।
कहां सभी ने सही हूं मैं फिर क्यों रिश्तो में इतनी खटास हुई।।
नहीं नहीं कोई समझ ना पाया जीत कर भी हार हुई।
जब खोल मन का दरवाजा अहम की गुत्थी से मुलाकात हुई।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”