जोर-जोर की बातों में, कुछ अनसुना सा रह गया।
जोर-जोर की बातों में, कुछ अनसुना सा रह गया।
तेरे मेरे भीतर से अहंकार का दरिया सरपट बह गया।।
लगा कि जैसे सूखी डाली, पेड़ से टूट के गिर गई।
पर शब्दों के बीच में, बारीक खामोशी का बंधन रह गया।।
लाख चाह मिट जाएं, अनकही बीच की सारी गलतफहमियां।
लेकिन अहम की खातिर, अपनेपन का भाव कहीं खो गया।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”
✍️✍️🥺🥺