रजनीगंधा
सुगंध समेटे रजनीगंधा की,
जब से तेरा प्यार मिला है।
महक उठी फ़िज़ाएँ भी सारी,
पूरा मधुवन खिला-खिला है।
महकती मुकुलित कलिकाएँ,
मन में मिठास भर देती हैं।
केशों में सज्जित गजरे की,
ख़ुशबू घायल कर देती है।
मनहर ख़ुशबू श्वेत पंखुड़ी,
हर सूना आँगन महकाए।
सजनी आहट पाकर पिय की,
रजनीगंधा सी खिल जाए।
हरित पर्ण और धवल पुष्प,
नैनों को बहुत लुभाते हैं।
मनभावन रजनीगंधा से तब,
हृदय-पुष्प खिल जाते हैं।
जीवन की बगिया में जबसे,
हँसती मुस्काती आयी हो।
रजनीगंधा के फूलों संग-संग,
तुम पूरा उपवन लायी हो।
#स्वरचित एवं मौलिक रचना
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’
कानपुर – 208002, उ.प्र.