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9 Jul 2025 · 1 min read

*आतंक का मंजर*

पुलवामा को भूले नहीं थे,
कि अब यह पहलगाम की घाटी का मंजर।

पूंछा धर्म उन सैलानियों से,
बताने पर हिंदू, घोंपा था सीने में खंजर।

था कितना खौफनाक दृश्य,
धड़ाधड़ चल रही थी गोलियां।

ऊधर सीने को चीरती मासूमों की चीख,
उन बेगुनाहों की भर्रायी बोलियां।

मेहंदी भी नहीं छुटी थी हाथ की,
सुहाग का चूड़ा भी वही था।

उजड़ गया संसार उस सुहागिन का,
सामने खून से लथपथ प्रियतम भी वही था।

मिट गया सिंदूर किसी का,
किसी की गोद सूनी थी।

मिनी स्विट्ज़रलैंड पहलगाम की,
वादियों वाली घाटी आज खूनी थी।

इससे बढ़कर नीचता की हद क्या होगी,
उन आतंकियों के लिए,
बड़ी से बड़ी सजा भी कम होगी।।

स्वरचित- डॉ० ओमवती ”यादकेत”
सैदनगली अमरोहा ( उ०प्र०)

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