#लघुकविता
#लघुकविता
#मानस_मंथन
*रचना लघु, मंतव्य बड़ा है।
#प्रणय_प्रभात
कभी कभी प्रभु प्रेरणा से गागर में सागर भरने जैसा काम हो जाता है। कोई प्रसंग सामने आता है और एक रचना का आकार लेना तय हो जाता है। प्रसंगवश सृजित रचना छोटी होकर भी बड़ा संदेश देने में समर्थ होती है।
ऐसा ही कुछ आज हुआ, जब फेसबुक पर टैग एक पोस्ट ने लघु में निहित गुरु का पक्ष तर्कपूर्वक रखने के लिए प्रेरित किया और अनायास फूट पड़ी यह पंक्तियां, जिन्हें आप एक पूर्ण कविता मान सकते हैं। पढिए…
चंदा सूरज को प्रणाम लाखों करते आए।
झिलमिल करते तारों को कोई तो अपनाए।।
*माना किसी विटप का रुतबा भारी होता है।”
पौधों का भी घर उपवन आभारी होता है।।
कंगूरे, गुंबद, मीनारें सब कुछ सुंदर हैं।
पूजे वो पाषाण खण्ड जो भू के अंदर है।।
हर छोटे की बड़ी महत्ता का कुछ ध्यान करो।
गुरु का आदर ठीक मगर लघु का भी मान करो।।
#कथ्य…
सच कहूं तो उक्त कविता का श्रेय एक अर्द्धाली को है, जो मानस से निकली है और मानस में अरसे से गूंजती आ रहीं है।
“को बड़ छोट कहत अपराधू” एक सार्थक व सारगर्भित चौपाई है। जिसका अर्थ है “कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना भी एक अपराध है।”
यह एक प्रसिद्ध चौपाई है जो महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरित मानस में समाहित है। इसका अर्थ है कि नाम और रूप दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, और यह कहना उचित नहीं है कि इनमे से कौन बड़ा है और कौन छोटा।
बस, मेरी आज की छोटी सी उक्त कविता का मंतव्य भी यही है। “सियाराम मय सब जग जानी” के मर्म से प्रेरित व प्रभावित होने के कारण। कह कर तो कविवर रहीम दास जी भी यही गए हैं कि…
“रहिमन देख बड़ेन को लघू न7 दीजे डार।
जहां काम आवे सुई कहा करे तरवार।।”
जय रामजी की।।
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संपादक
न्यूज़&व्यूज
(मध्यप्रदेश)