जो तुम मुझे जानना चाहो
जब तुम मुझे जानना चाहो
तो मुझे उस समय मत टटोलना
जब मेरी आँखों में प्रकाश हो,
जब मेरा स्वर गूंजता हो सभाओं में,
या जब मैं अपनी सफलता के शिखर पर
अलंकृत खड़ा दिखूँ।
मुझे जानना
उस क्षण में,
जब शब्द मुँह तक आकर रुक जाते हैं
और मौन
अपने अर्थों से भारी हो जाता है।
जब मेरी आत्मा
एक निर्वात में भटकती हो,
जैसे किसी पुरानी मंदिर की घंटियाँ
वर्षों से न बजी हों,
फिर भी उनकी प्रतिध्वनि
पत्थरों में काँपती हो।
मैं जो बाहर दिखता हूँ, वह नहीं हूँ।
मैं वह हूँ
जो रात्रि के चौथे प्रहर
अपने ही प्रश्नों से उलझता है,
और अस्तित्व के ताने-बाने में
अपनी उपस्थिति को परखता है।
मुझे तब समझना
जब मैं जीवन के मध्य
एक रिक्त स्थान-सा प्रतीत होऊँ,
जहाँ प्रेम भी आता है,
पर टिक नहीं पाता
जैसे बादल छूकर भी पर्वत को भिगो नहीं पाते।
मेरे अंतर में उतरना
जैसे कोई नदी
चुपचाप पत्थरों को छूकर
अपना मार्ग बना ले,
बिना शोर किए।
मेरी आत्मा के उस पृष्ठ को पलटना
जिसे मैंने स्वयं कभी नहीं पढ़ा,
जहाँ अस्तित्व प्रश्न है,
उत्तर नहीं।
और यदि तुम कभी मुझे
पूर्णता से जान सको
तो मुझे यूँ जानना
कि मैं स्वयं को
तुम्हारी आँखों में
पहचान सकूँ
बिना किसी भय,
बिना किसी आवरण।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’