गुरूर में जो जी रहा
ग़ज़ल
1,,
गुरूर में जो जी रहा ,वो सच में आदमी नहीं ,
जो बीच राह छोड़ दे ,कभी वो दोस्ती नहीं।
2,,,
सफ़र में ज़िंदगी रही , चली इधर चली उधर ,
ये शौक़ मुझको ले चला, मेरी ये बेबसी नहीं ।
3,,,,
मुझे जो देख कर तुम्हें हुआ है कुछ अभी इधर ,
ज़रा सा इक लगाव है, ये सिर्फ़ आशिक़ी नहीं।
4,,,,
चमक गया शहर शहर , जमीं से आसमां तलक,
ये नूर बस खुदा का है, क़मर की चांदनी नहीं ।
5,,,,
फिज़ा हसीन हो गई , हरा भरा चमन हुआ ,
हवा भी झूम के चली , मगर मुझे मिली नहीं।
6,,,,
वो मुस्कुरा के चल दिये , कहीं डगर, कहीं नज़र,
ज़रा सा रुक गए क़दम, अजी ये काहिली नहीं।
7,,,,
क़रीब आ के कान में , कहा तु ही है दिलरुबा ,
मैं होश में हूँ , बाखुदा, ये नील बेखुदी नहीं।
✍️ नील रूहानी,
( नीलोफर खान )