प्रेम की परिभाषा
दिलों में पलता नाज़ुक अहसास,
चाहे रहो दूर चाहे रहो पास।
हिलोर लेती उन्मुक्त तरंगे,
कराती अथाह गहराई का आभास।
अपनेपन की ख़ुशबू से उपजी आशा,
यही तो है प्रेम की परिभाषा।।
इंतज़ार में अधीर होता मन,
विकल हृदय की बढ़ती धड़कन।
दिल के तारों का अदृश्य जुड़ाव,
आँखों में खिलखिलाता उपवन।
बयां करती मन की अभिलाषा,
यही तो है प्रेम की परिभाषा।।
प्रेम तो मूक भाषा है नैनों की,
अव्यक्त अभिलाषा है अधरों की।
बिन कहे ही सब कुछ कह देती,
जैसे पुष्प में जिज्ञासा है खिलने की।
चाँद को निहारते चकोर की आशा,
यही तो है प्रेम की परिभाषा।
यही तो है प्रेम की परिभाषा।।
#स्वरचित एवं मौलिक रचना
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’
कानपुर – 208002, उ.प्र.