परिचय स्वयं का
हमारा मूल मंत्र है शिक्षा,
सुर मैं वही सजाता हूँ।
सोच परिंदों की उन्मुख हो,
ऐसे बाज बनाता हूँ।
अनुशासन है बहुत जरूरी,
पालन खुद भी करता हूँ।
जिन राहों में दिखे अँधेरा,
उस पथ दीपक धरता हूँ।
जरूरतमंद यदि कहीं दिखे,
ख़ुद मैं हाज़िर रहता हूँ।
हाथ मदद को भी बढ़ जाते,
भाव समर्पण रखता हूँ।
ज्ञान पताका हाथों में ले,
अलख जगाने निकला हूँ।
ज्योति पुंज बन जुगुनू जैसा,
तिमिर मिटाने निकला हूँ।
मन में जोश बहुत है लेकिन,
संयम पथ अपनाता हूँ।
धैर्य धार कर्तव्य मार्ग पर,
सरपट बढ़ता जाता हूँ।
भावों का अतिरेक समेटे,
शब्द-जाल भी बुनता हूँ।
मूक तरंगित लहरों की,
हर हिलोर को सुनता हूँ।
शूल भरी राहें आएँगी,
चलना हो तो चलो सखे।
पाँवों के छाले मत देखो,
आँखों से बस लक्ष्य दिखे।
धुंध भले ही दिखे सामने,
हौले से पग धरता हूँ।
ठान लिया हारना नही है,
तभी अकेला चलता हूँ।
#स्वरचित एवं मौलिक रचना
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’
कानपुर – 208002, उ.प्र.