तोरे नैना
✍️ रचनाकार: श्रीहर्ष
तोरे नैना —
अमावस्याक राति जेकाँ,
कतहु दीप जरल — काँपैत लौमे हमर छाया हेराएल।
तूँ चुप —
मुदा तोहर नयन कहि देलनि से सभ,
जे शब्द कखनो नै कहि सकल।
ओ चितवन —
जेना नदीक धार — शान्त, मुदा भीतर बहैत
अकथ ज्वार सन।
हम बूझलहुँ —
लोरी नहि छल ई,
ई तऽ आत्माक गुप्त आरोह —
जे हृदयक सीढ़ी सँ ऊपर चढ़ल।
तोरे नैना —
मोर मोनक भूगोल ,
जतय दुःखो प्रेममे पिघैल जाएत ।
पुछलहुँ अपने सँ —
“की ई नजरि भाग्यक प्रश्न की?”
आ उत्तर भेटल —
“तोरे नैना — स्वयं उत्तर थिक!”
–श्रीहर्ष