लेख: "सबसे पवित्र है स्वयं के अपवित्र विचार और कृत्य को मन से स्वीकार करना"
लेख: “सबसे पवित्र है स्वयं के अपवित्र विचार और कृत्य को मन से स्वीकार करना”
हम पवित्रता को अक्सर बाहरी व्यवहार, रीति-रिवाज़ों, या धार्मिक अनुशासन से जोड़कर देखते हैं। लेकिन क्या सच्ची पवित्रता केवल बाहर से ‘अच्छा’ दिखने में है, या भीतर से सच्चे और प्रामाणिक होने में? एक अत्यंत गहरी और जागरूकता भरी बात है।
“सबसे पवित्र है स्वयं के अपवित्र विचार और कृत्य को मन से स्वीकार करना।”
यह वाक्य किसी धार्मिक पुस्तक का उपदेश नहीं, बल्कि आत्मबोध की ओर एक आमंत्रण है। यह हमें हमारी सबसे छुपी, सबसे असहज सच्चाइयों के सामने नतमस्तक होना सिखाता है।
पवित्रता का अर्थ क्या है?
पवित्रता केवल शुद्धता नहीं, सत्यता भी है। यह कोई स्थायी अवस्था नहीं, बल्कि एक सतत प्रयास है स्वयं को समझने और स्वीकारने का।
जब हम अपने भीतर उठते ईर्ष्या, घृणा, लालच, डर, या अभिमान को देख पाते हैं और उन्हें छिपाने की बजाय स्वीकार करते हैं, तभी हम वास्तव में पवित्र बनते हैं।
स्वीकृति ही पहला मोक्ष है
हम सभी में कहीं न कहीं दोष होते हैं; विचारों में, व्यवहार में, भावनाओं में। लेकिन दोष होना ही पाप नहीं है, उन्हें झुठलाना, दबाना या दूसरों पर थोपना ही आत्मिक विकृति है।
जो व्यक्ति कह सके –
“हाँ, मुझसे गलती हुई है। हाँ, मैंने बुरा सोचा था।”
वह भीतर से सशक्त हो जाता है। यह साहस आत्मा की पहली मुक्ति है।
स्व-स्वीकृति से आता है आत्मप्रेम
हम तब तक स्वयं से प्रेम नहीं कर सकते जब तक हम अपने दोषों को भी गले नहीं लगाते।
जैसे मां अपने बच्चे की गंदगी साफ करते समय उससे प्रेम करना नहीं छोड़ती, वैसे ही हमें अपने मन के गंदे कोनों को भी उसी करुणा से स्वीकारना सीखना चाहिए।
पाखंड नहीं, प्रामाणिकता चाहिए
आज का समाज हमें “अच्छा दिखने” की दौड़ में डाल देता है, हम बाहर से धार्मिक, नैतिक और सज्जन बनने का प्रयास करते हैं, लेकिन भीतर की पीड़ा, भ्रम और छटपटाहट को दबा देते हैं।
यह पाखंड है। और यही पाखंड हमें सबसे ज्यादा तोड़ता है।
जब हम अपने मन की ‘अपवित्रताओं’ को स्वीकार करते हैं, तब हम प्रामाणिक बनते हैं— और यही प्रामाणिकता सच्ची आध्यात्मिकता है।
स्वीकृति – परिवर्तन की चाबी
जो अपने दोषों को देख लेता है, वह उन्हें सुधार भी सकता है। लेकिन जो उन्हें स्वीकार ही नहीं करता, वह जीवन भर दूसरों को दोष देता रहता है।
स्वीकृति कोई कमजोरी नहीं, यह चेतना की परिपक्वता है। यही वह क्षण है जहां आत्म-परिवर्तन की शुरुआत होती है।
पवित्रता कोई आदर्श स्थिति नहीं है, वह एक यात्रा है —
अपने भीतर के अपवित्र से मिलकर, उसे समझकर, स्वीकार करके आगे बढ़ने की।
जब हम स्वयं से यह कह सकें— “मैं जैसा हूँ, वैसे को स्वीकार करता हूँ,” — तब ही हम सच्चे अर्थों में शुद्ध, निर्द्वंद्व और पवित्र हो पाते हैं।
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”