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6 Jul 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . छलिया

दोहा पंचक. . . . छलिया

छलिया तेरी बात का, कौन करे विश्वास ।
बाट जोहते थक गया, नयनों का मधुमास ।।

छलिया तेरी छल भरी , बातों में वह बात ।
बिन तेरे सूनी लगे, धवल चाँदनी रात ।।

छलिया तूने प्रेम का, डाला ऐसा जाल ।
बाहुपाश में खो गई, हो कर देह निढाल ।।

छल से छलिये ने किया, आभासी अनुराग ।
भोर काल में चल दिया, दे दामन में दाग ।।

छलिये का होता नहीं, सत्यपरक विश्वास ।
इससे करना व्यर्थ है, अमर प्रेम की आस ।।

सुशील सरना / 6-7-25

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