दोहा पंचक. . . . छलिया
दोहा पंचक. . . . छलिया
छलिया तेरी बात का, कौन करे विश्वास ।
बाट जोहते थक गया, नयनों का मधुमास ।।
छलिया तेरी छल भरी , बातों में वह बात ।
बिन तेरे सूनी लगे, धवल चाँदनी रात ।।
छलिया तूने प्रेम का, डाला ऐसा जाल ।
बाहुपाश में खो गई, हो कर देह निढाल ।।
छल से छलिये ने किया, आभासी अनुराग ।
भोर काल में चल दिया, दे दामन में दाग ।।
छलिये का होता नहीं, सत्यपरक विश्वास ।
इससे करना व्यर्थ है, अमर प्रेम की आस ।।
सुशील सरना / 6-7-25