Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
5 Jul 2025 · 3 min read

बिजलीबाई

बिजलीबाई की कथा: निजीकरण के विरुद्ध एक जनआंदोलन

बिजली अब गाँव की लड़की नहीं रही,
जो खंभे से लटक कर
हर रात घरों को रोशन कर देती थी।

वह अब
कंपनी बन गई है
लोगो लगी, शेयरों में तनी,
पॉलिसी की भाषा बोलती,
कॉल सेंटर में बैठी प्रतीक्षा करवाती।

अब मीटर घर के बाहर नहीं,
अंदर धड़कता है ऐप में,
जहाँ
बिल बढ़ता है हर सांस के साथ
और कटौती
SMS से पहले
आ जाती है हृदय में।

लाइट अब सिर्फ़ सुविधा नहीं,
“प्लान” है,
“स्लैब” है,
“कस्टमर सेगमेंट” है।
ग़रीब होना अब सिर्फ़ दुख नहीं,
“नॉन-प्रॉफिटेबल ज़ोन” होना है।

लाइनमैन अब नहीं आता
लाइन ठीक करने,
वो अब “टेक्नीशियन” है
जो तब आता है
जब टिकट नंबर OTP से मेल खाता है।

बिजली पहले आती थी
तो लगता था सरकार साथ है।
अब जब आती है
तो डर लगता है
कहीं बैलेंस तो नहीं कट गया?

गाँव की गलियों में
अब भी कुछ खंभे
सर झुकाए खड़े हैं,
जैसे पुरानी यादें
जिन्हें कंपनी की बैठक में
“लॉस मेकिंग असेट” कहा गया।

बिजली अब ‘हक़’ नहीं रही,
वह ‘सर्विस’ है
जिसे तुम
तब तक पा सकते हो
जब तक तुम्हारे वॉलेट में
कुछ वोल्ट बचा हो।

बिजलीबाई,
जो कभी हर शाम
घरों की छतों पर
रोटी से पहले आती थी,
अब
हाईटेंशन तारों में क़ैद है
सस्ती नहीं, संविदा पर है।

पहले वो
हर झुग्गी में भी
एक बाती सी जलती थी।
अब पूछती है
“तुम्हारे घर में स्मार्टमीटर है या नहीं?”

गाँव की बूढ़ी अम्मा
जो हर आंधी के बाद
लाइनमैन को चाय पिलाती थी,
आज फोन घुमाकर थक गई है
बिजलीबाई की कॉलर ट्यून में
केवल ‘नंबर व्यस्त है’ बजता है।

एक दिन
जनता ने हिम्मत की,
लाइन पर खड़े हो गए
बल्ब, पंखा, रेडियो, फ्रिज
सब अपने-अपने प्लग लेकर।
“हमें रोशनी चाहिए,
चाहे निजी हो या सरकारी,
पर इंसान के बराबर!”

बिजलीबाई चौंकी,
इतने दिनों बाद किसी ने
उससे कुछ माँगा
मोल से नहीं, हक़ से।

वह नीचे उतरी,
एक बल्ब में भरकर
एक झोपड़ी में जल गई,
बोली
“मैं किसी एक की नहीं,
मैं उस आँधी की बेटी हूँ
जो अंधेरे से डरती नहीं!”

जब उजाले को
पैसे में तोला गया,
और अंधेरे को
सब्सिडी की भाषा में समझाया गया
तब
जनता ने रोशनी को
अपनी मुट्ठी में बाँधने का संकल्प लिया।

बिजलीबाई,
जो अब तक सिस्टम की
दीवारों से टकरा कर
थक चुकी थी,
एक बार फिर
लौट आई
इस बार नंगे तारों में नहीं,
लोगों की आँखों की चिंगारी में।

गाँव के चौराहे पर
किसी ने लालटेन उठाई,
किसी ने पुराने ट्रांजिस्टर में
जन-गीत बजाया,
और किसी ने बोर्ड पर लिख दिया
“अब बिजली नहीं, हक़ लौटाओ!”

लाइनमैन,
जो अब तक “ऑफलाइन” था,
कंधे से सीढ़ी उतार लाया
बोला
“मैं भी हूँ तुम्हारे साथ,
जब सेवा, सेवा न रहे,
तो मैं नौकरी नहीं,
इंसानियत चुनता हूँ।”

छात्रों ने
अपने मोबाइल की टॉर्चें जलाईं,
किसानों ने
पानी के पंप की नब्ज़ थामी,
स्त्रियों ने
कढ़ाई छोड़
तारों की गाँठें खोलनी शुरू कीं।

शहरों में, गाँवों में, बस्तियों में
हर ओर
“लाइट नहीं, अधिकार चाहिए!”
का नारा
बिजली के पोल से गूंजने लगा।

और सत्ता?
वह चकित थी
उसे उम्मीद थी लोग
बिल भरेंगे,
पर ये क्या
लोग अब
सवाल भरने लगे थे।

अब यह सिर्फ़ बिजली की बात नहीं थी,
यह
उस उजाले की माँग थी
जिसमें
हर चेहरा दिखे
बिना जात, बिना स्लैब,
बिना “टर्म्स एंड कंडीशन्स” के।

बिजलीबाई मुस्कराई
पहली बार,
उसे महसूस हुआ
कि वह
बिकाऊ नहीं,
जागृति है।

और तभी
भीड़ से उठा एक स्वर,
जो मीटर के नंबरों से नहीं,
दिल की धड़कनों से गूंजा

“बिजली का निजीकरण भगाओ!”
“हर घर में फिर उजाला लाओ!”
“कंपनी नहीं, ज़रूरत है हक़ की
जनता की बिजली, जनता को दो वापस!”

Loading...