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5 Jul 2025 · 1 min read

अपने मन से जो घायल हैं

गीत
अपने मन से जो घायल हैं
उनको कुछ समझाना जी
मोर पंख से दुख कब जाते
बस खुद को बहलाना जी

जीवन कहता जीना सीखो
पैरों में घुंघरू बांधो
धरती नापो अम्बर नापो
कुछ साहस के पर खोलो
करना पड़ता काम धरा पर
पग पग पग चल जाना जी

करे आचमन निज प्रण तूने
भोर दिवस की लाली में
अब क्यों बैठा ओढ उदासी
सांसों की रखवाली में
जिजीविषा को रख तू जिंदा
दिनकर सा खिल जाना जी।।

संन्यासी इस मन के सारे
कोटि कुटुंब अवतार सजे
अवलंबन की रज माथे पर
लगी , मुक्ति के द्वार खुले
सोच रहा है क्या तू पगले
चूम क्षितिज उड़ जाना जी

सूर्यकांत

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