अपने मन से जो घायल हैं
गीत
अपने मन से जो घायल हैं
उनको कुछ समझाना जी
मोर पंख से दुख कब जाते
बस खुद को बहलाना जी
जीवन कहता जीना सीखो
पैरों में घुंघरू बांधो
धरती नापो अम्बर नापो
कुछ साहस के पर खोलो
करना पड़ता काम धरा पर
पग पग पग चल जाना जी
करे आचमन निज प्रण तूने
भोर दिवस की लाली में
अब क्यों बैठा ओढ उदासी
सांसों की रखवाली में
जिजीविषा को रख तू जिंदा
दिनकर सा खिल जाना जी।।
संन्यासी इस मन के सारे
कोटि कुटुंब अवतार सजे
अवलंबन की रज माथे पर
लगी , मुक्ति के द्वार खुले
सोच रहा है क्या तू पगले
चूम क्षितिज उड़ जाना जी
सूर्यकांत