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5 Jul 2025 · 1 min read

दोहा सप्तक. . . . विविध

दोहा सप्तक. . . . विविध

होता अपने आप से, बड़ा भयंकर युद्ध ।
जीत गया जो युद्ध यह, कहलाता वह बुद्ध ।।

परिधानों से कब हुआ, कोई योगी संत ।
नकली फूलों से कभी , आता नहीं वसंत ।।

तब तक होता ही नहीं, जीवन का उद्धार ।
जब तक अंतस के नहीं , होते दूर विकार ।।

कर्मों का संसार में, कोई नहीं विकल्प ।
सत्य मान यह जिंदगी, जीनी हमको अल्प ।।

धर्म – कर्म को मानते, जीवन में जो व्यर्थ ।
गीता के उपदेश का, वह क्या समझें अर्थ ।।

अंध भक्त परिणाम से, हरदम रहता दूर ।
बिना कर्म सब कुछ मिले, इसमें रहता चूर ।।

नयन मून्द हर बात पर, जो करता विश्वास ।
उसकी जीवन में सदा, खंडित होती आस ।।

सुशील सरना / 5-7-25

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