दोहा सप्तक. . . . विविध
दोहा सप्तक. . . . विविध
होता अपने आप से, बड़ा भयंकर युद्ध ।
जीत गया जो युद्ध यह, कहलाता वह बुद्ध ।।
परिधानों से कब हुआ, कोई योगी संत ।
नकली फूलों से कभी , आता नहीं वसंत ।।
तब तक होता ही नहीं, जीवन का उद्धार ।
जब तक अंतस के नहीं , होते दूर विकार ।।
कर्मों का संसार में, कोई नहीं विकल्प ।
सत्य मान यह जिंदगी, जीनी हमको अल्प ।।
धर्म – कर्म को मानते, जीवन में जो व्यर्थ ।
गीता के उपदेश का, वह क्या समझें अर्थ ।।
अंध भक्त परिणाम से, हरदम रहता दूर ।
बिना कर्म सब कुछ मिले, इसमें रहता चूर ।।
नयन मून्द हर बात पर, जो करता विश्वास ।
उसकी जीवन में सदा, खंडित होती आस ।।
सुशील सरना / 5-7-25