"दुःख को अब सुख मान चुका हूँ ll
“दुःख को अब सुख मान चुका हूँ ll
दुःख को सब-कुछ मान चुका हूँ ll
आत्मसमर्पण कर दिया है मैंने,
हार अपनी खुद मान चुका हूँ ll
अपनों और सपनों की खातिर,
कर लिया बहुत, मान चुका हूँ ll
जिम्मेदारियों से झुक रहा है,
जीवन का रुख जान चुका हूँ ll
खुल कर रो भी नहीं सकता,
बेबस है पुरुष जान चुका हूँ ll”