सबकुछ ठीक होने का दम भर रहा हूँ ll
सबकुछ ठीक होने का दम भर रहा हूँ ll
मैं अब लिखना थोड़ा कम कर रहा हूँ ll
वक्त के नियम का पालन करते हुए मैं,
नये जख्मों से पुराने जख्म भर रहा हूँ ll
स्वप्न और रोने के लिए बनी आंखों पर,
दोनों न करके हुए मैं सितम कर रहा हूँ ll
सच के इंतजार में भूखा न मरना पड़े इसीलिए,
मैं खुशी-खुशी अब झूठ को ही हजम कर रहा हूँ ll
वैसे तो मुझे किसी बात का ग़म नहीं है,
हां मगर मैं इसी बात का ग़म कर रहा हूँ ll