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5 Jul 2025 · 1 min read

बिना पैसों के अब प्यार नहीं ll

बिना पैसों के अब प्यार नहीं ll
व्यापार है यह, व्यवहार नहीं ll

मैं तुम्हारे उस भगवान को कैसे मान लूँ,
जो सिर्फ प्राथनाएं सुनता है, चीख-पुकार नहीं ll

इतवार को और काम बढ़ जाता है,
क्यों गृहणियों के हक में इतवार नहीं ll

बिना सिर पैर के जिंदा है,
झूठ का कोई आधार नहीं ll

मैं मजे के लिए नहीं, सबके लिए लिखता हूँ,
इसलिए मेरी भाषा-शैली गंभीर हैं, मजेदार नहीं ll

इंसान चील कौवे सियार बने फिर रहे हैं,
कौन है जो इनके हमलों से शिकार नहीं ll

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