दोहा दशम. . . . . ढोंगी
दोहा दशम. . . . . ढोंगी
बाबाओं का आजकल, खूब चला दरबार ।
दुख हरने के नाम पर, करते हैं व्यापार ।।
पागल जनता लो चली, बाबाओं के द्वार ।
धक्के खाये सौ मगर, हुआ न कुछ उद्धार ।।
तिलक लगाया माथ पर, बन बैठे भगवान ।
भोली जनता ढूँढती, उनमें सभी निदान ।।
बाबाओं के द्वार पर, लगी भक्तों की भीड़ ।
सुख पाने की चाह में, भूले अपना नीड़ ।।
क्या जाता है सन्त का, कुचली जाती भीड़ ।
भगदड़ में जानें गईं, मिटा किसी का नीड़ ।।
ढोंगी बाबा से सदा, भक्तो रहो सचेत ।
यह वो थलचर जो चरे, सदा जेब का खेत ।।
कुछ भागे कुछ गिर गए, कुछ को रहा न चेत।
भगदड़ से पंडाल में, उड़ी रेत ही रेत ।।
धन लोलुप संसार में, धर्म कर्म सब व्यर्थ ।
बाबा भी पूछे उसे, रखता है जो अर्थ ।।
सोच- समझ कर दीजिये , उचित पात्र को दान ।
असल- नकल की आजकल, कम होती पहचान ।।
करें कथा की आड़ में, बाबा ऐसे काम ।
अर्थ लूट कर धर्म को, ये करते बदनाम ।।
सुशील सरना / 4-7-25