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3 Jul 2025 · 1 min read

मेघा बरसेंगे सार छंद

पीहर की पनघट यूँ बोली, अब मेघा बरसेंगे।।
बूंदों ने लिख दी गाथा लो ,अब नैना तरसेंगे।।

उम्मीदों की चिट्टी लिख दी,मोहर मेघ लगाई।
चुप्पी में भी गरज उठी है, मेघों की अँगडाई।।
भीतर-भीतर भीग गये जो, मन फिर भी हर्षेंगे।
बूंदों ने लो लिख दी गाथा , अब नैना तरसेंगे।।

पीहर की देहरी न छूटी, सावन घिर के आये।
झूलों की पींगे ललचाती,बाबुल क्यों न बुलाये।
मेघ झूम के अब बरसेंगे, बंधन सभी खुलेंगे।
बूंदों ने लो रच दी गाथा, अब नैना तरसेंगे।।

प्रमुदित मन से प्रियतम आये, लेकर सब सौगातें।
अँगडाई करती अठखेली,नैना करते बातें।।
श्वांसों की थिरकन ने बोला,कब बारिश भीगेंगे।
बूंदों ने लो लिख दी गाथा ,अब नैना तरसेंगे।।

बूंदों की चुप्पी अब बोले , राग फुहारों वाला।
बाँह पसारी आँगन ने जब,*पहन स्मरण की माला*।।
धरती -मेघा प्रीत अनोखी, भाव -भाव सरसेंगें।
गीत मिलन के मल्हार आज,सुनने को तरसेंगे।।
मनोरमा जैन पाखी

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