संत कान्हो पात्रा
[08/07, 1:03 pm] dr rk sonwane: ///संत कान्हो पात्रा///
पवित्र निष्ठ सलिल की धारा,
जिसकी जीवन यात्रा।
देवदासी पुत्री विट्ठल चरणों में,
समर्पित कान्हो पात्रा।।
मंगलवेढ़ा धाम में श्यामा,
देव मंदिर की देवदासी।
गणिका थी कुशल कलावंत,
अतुल सौंदर्य की राशि।।
नृत्य संगीत निपुण अप्सरा,
थी गंधर्व रस प्रवीण।
उप पत्नी जमीदार की संपन्न,
भोग विलास में लीन।।
भाव भक्ति से दूर उसका,
कषाय भरा जीवन।
उसकी दासी हौसा का था,
विट्ठल भक्ति सना मन।।
औरस पुत्री जमीदार की,
जन्मी कोख से एक।
चरित्र था उज्जवल पावन,
गुण शील भरे अनेक।।
माता श्यामा के जीवन का,
उसको लगा ना अंश।
कान्हो पात्रा नाम था उसका,
उसे सालता गृहदंश।।
स्खलित गोलोकवासी सखी थी,
शापित हो आई भिन्न।
उसकी तो प्रकृति ही विपरीत थी,
होती रहती यहां खिन्न।।
अल्प आयु में उसने सीख लिया,
गंधर्व गुण का रहस्य।
निष्णात हुई वह नृत्य संगीत में,
करती उन पर सुभाष्य ।।
सुन प्रशंसा उसके सौंदर्य गुणो की,
नृत्य की संगीत की।
ललचाते दृग अनेक देकर हवाला,
गणिका की रीत की।।
जब देखा जमींदार ने उसका,
लास्य भरा नृत्य और संगीत।
अकुला गया करने उसका भोग,
जागी उसमें वासना भरी प्रीत।।
श्यामा बोली है तुम्हारी औरस पुत्री,
करो न ऐसा यह पाप।
क्यों लगाते हो पितृत्व पर कलंक ,
जीवन भर ताप संताप।।
तब भी उसके मन में था सपना,
कान्हो के ही भोग का।
कुछ भी निवारण सूझता नहीं था,
जमीदार के इस रोग का।।
श्यामा से और कान्हो से भी,
ऐसी अनुमति मिली नहीं।
रोक दी उसने उनकी धनचर्या,
वे हो गई तब विपन्न वहीं।
कान्हो बोली मैं उसको ही वरूंगी,
जो मुझसे होगा श्रेष्ठ।
तब ऐसा कोई उनको मिला नहीं,
गुणों में हो उनसे ज्येष्ठ ।।
कान्हो बाला के हृदय में थी,
विट्ठल चरणों की लौ सदा।
उन्हें हरी विग्रह में समाना था,
ऐसा सुंदर उन्हें भाग्य बदा।।
एक दिन जब वे विट्ठल भजन में,
लीन थी सो पड़ी थी।
जब जागी तो पाया वारी मंडली,
उनके द्वारा खड़ी थी।।
लिया भिक्षुणी वेश,
कामना नहीं लवलेश।
हौसी दासी के संग,
होकर वारी का अंग।।
पहुंच गई पंढरपुर धाम को।।।
नाम संत भक्ति में लीन,
नृत्य गान संकीर्तन प्रवीण।
विट्ठल चरणों की थी आस,
गर्भ गृह में विग्रह के पास।।
रच अभंग भजती प्रभु नाम को।।।
जब कान्हो को नहीं पाया,
जमीदार बौखलाया।
बखान सुनाकर सौंदर्य का,
नवाब को उकसाया।।
बीदर नवाब को थी आस,
रखूंगा उसे हरम में पास।
देकर ले आने का आदेश,
भेजी सेना पंढरपुर वास।।
करना वहां सभी प्रयास।।।
रखने अस्मिता पंढरपुर के धाम की,
वह चलने नवाब के पास तैयार हुई।
आज्ञा लेकर अंतिम दर्शन विट्ठल के,
जाकर हुई प्रभु चरणों में तल्लीन,
प्राणजोत विट्ठल विग्रह में समा गई।।
तब चंद्रभागा उफनी आई बाढ़ भयंकर।
सेना बहा ले गए कुटिल नवाब की प्रलयंकर।।
बाढ़ उतरने पर मिला शव मंदिर के प्रांगण में।
वही उग आया एक वृक्ष मंदिर के आंगन में।।
आज भी संतों की आस्था का स्थल ,
समाधि में कान्हू वृक्ष खड़ा है।
हो गई धन्य वह भक्त परम पुनीता,
वहीं उनका चैतन्य जड़ा है।।
स्वरचित अनुशील रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)