हमराही
मेरे जीवन पथ के हमराही,
तुमसे कितना मैं स्नेह करूँ ?
हर विषय भोग से पृथक हुई,
मैं आत्मिक स्नेह विदेह करूँ।।
जीवनपथ पर यूँ नही कोई,
मिलता या होता मेल यहाँ।
यह परमात्मा की कृपादृष्टि,
सांसारिक रचता खेल यहाँ।।
प्रिय वामांगी, बनूँ सुखकारी,
इस हृदय-कुंज में नेह भरूँ।
हर विषय भोग से पृथक हुई,
मैं आत्मिक स्नेह विदेह करूँ।।
आत्मा पर अवलम्बित काया,
जब भी यह कभी उदास हुई।
स्नेहिल शब्दों का तीर छोड़,
दिया हर्ष मुझे जो हताश हुई।।
पथ के कुछ राही छूट गए !
शापित हूँ क्या? संदेह करूँ।
हर विषय भोग से पृथक हुई,
मैं आत्मिक स्नेह विदेह करूँ।।
कठिन डगर चलना मुश्किल,
पर प्रतिपल तुमने साथ दिया।
जब अंर्तमन भी था विचलित,
झट तुमने अपना हाथ दिया।।
आत्मा का अमर प्रेम हो तुम,
यह हृदय तुम्हारा गेह करूँ।
हर विषय भोग से पृथक हुई,
मैं आत्मिक स्नेह विदेह करूँ।।
@स्वरचित व मौलिक
कवयित्री शालिनी राय ‘डिम्पल’✍️
आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।