गुलोंटीन
गुलोटीन
गुलोटीन एक मशीन थी,
सिर्फ़ एक झटके में
सिर धड़ से अलग कर देती थी,
बिना चीख, बिना चूक।
कहते हैं —
“न्याय तेज़ होना चाहिए,
जैसे ब्लेड की धार।”
डॉ. गिलोटिन ने इसे
दया के नाम पर गढ़ा था,
“मरना तो है ही,
कम से कम दर्द न हो।”
पर irony की किताब में
ये सबसे मोटा अध्याय बन गया —
गुलोटीन का आविष्कारक
गुलोटीन से ही मारा गया।
क्योंकि दुनिया में धार
कभी भी पलट सकती है।
जो औजार गढ़ते हैं
दूसरों के गले के लिए,
वही औजार
एक दिन उनके कंधे भी ढूंढ लेते हैं।
जो गुलोटीन बनाता है,
वो ये भूल जाता है —
धारें सिर्फ़ बाहर नहीं होतीं,
भीतर भी होती हैं।
और जो दूसरों की आवाज़ काटता है,
कभी न कभी,
ख़ुद अपनी ही आवाज़ की गूँज में खो जाता है।
आवाज़ों की हत्या से
सन्नाटा नहीं बनता,
सिर्फ़ इंतज़ार बनता है —
एक नए विस्फोट का।
सत्ता की धार जब
अंधा न्याय पहन लेती है,
तब ‘इंसाफ़’
कठघरे में खड़ा मिलता है।
हर कटते गले के साथ
धार थोड़ा और भटकती है,
और इतिहास की स्याही
थोड़ी और लाल हो जाती है।
आज —
जो आज़ादी के नाम पर
नौकरियों की हत्या करते हैं,
जो दफ़्तरों की इमारतें
नीलामी में नीलाम कर देते हैं,
कहते हैं — “यह विकास है”,
असल में वो
सिर्फ़ मुनाफ़े की गुलोटीन चला रहे होते हैं।
हर एक निजीकरण
बस एक कंधा काटता है —
किसी किसान का,
किसी मज़दूर का,
किसी अदृश्य कर्मचारी का,
जिसकी आवाज़ शायद
अख़बारों तक नहीं पहुँचती।
पर याद रखो —
गुलोटीन पलटती है,
इतिहास करवट लेता है।
और जब पूंजी के ये मंदिर ढहेंगे,
तो सबसे पहले
वही ‘लाभार्थी’
अपने माथे पर हाथ रखेंगे।
क्योंकि जो व्यवस्था
केवल लाभ की नींव पर खड़ी होती है,
वो न इंसान बचाती है,
न इंसानियत।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’