जिसे इस खून से सींचे वहीं आवाज़ बनेंगे ,
जिसे इस खून से सींचे वहीं आवाज़ बनेंगे ,
न मुजरिम कल थे और न हम आज बनेंगे।
ये दौर बहरे हुकूमत का जिसे हम समझ नहीं सकते,
ज़ुल्म कितना भी कर लो हम मुल्क की आवाज़ बनेंगे।
Phool gufran
जिसे इस खून से सींचे वहीं आवाज़ बनेंगे ,
न मुजरिम कल थे और न हम आज बनेंगे।
ये दौर बहरे हुकूमत का जिसे हम समझ नहीं सकते,
ज़ुल्म कितना भी कर लो हम मुल्क की आवाज़ बनेंगे।
Phool gufran