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2 Jul 2025 · 1 min read

दोहा सप्तक. . . . प्रणय शृंगार

दोहा सप्तक. . . . प्रणय शृंगार

अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम ।
जज्बातों के वेग से, देह हुई बदनाम ।।

नयनों के संवाद का, अधर करें अनुवाद ।
मौन तोड़ मुखरित हुए, अंतस के उन्माद ।।

उनसे मिलने के लिए, तोड़े सब अवरोध ।
बेकाबू मन ने किये, स्वीकृत दृग अनुरोध ।।

जैसे- जैसे दिन ढला, मौन हुए साकार ।
नयनों में मुखरित हुए, अनुरोधों के ज्वार ।।

अधरों का जब- जब करें, अधर गहन अभिसार ।
रचे प्रेम संवाद से रच,देह नया संसार ।।

अद्भुत होता प्रेम का, मंद – मंद मकरंद ।
अधरों पर विचरित करे, प्रथम प्रणय आनन्द ।।

अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध ।
पोर -पोर में देह के, महकी अद्भुत गंध ।।

सुशील सरना / 2-7-25

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