ऊंट और जीरा
व्यंग्य
ऊंट और जीरा
कुछ कहावतें बड़ी रोचक होती हैं। ऊंट के मुंह में जीरा। मुहावरा बनाने वाला चला गया। करते रहो व्याख्या। लोग सिर धुन रहे हैं। ऊंट के मुंह में जीरा रख रहे हैं। अव्वल तो बहुतों को जीरा का महत्व पता नहीं। बहुत जानते भी नहीं होंगे। हमको भी नहीं पता था। जब से बजट पढ़ने लगे तो महत्व समझने लगे। पहले हर बजट पर विपक्ष बोलता था.. ऊंट के मुंह में जीरा। अब उसका जीरा ही बंद।
ऊंट को रेगिस्तान का जहाज़ कहा जाता है। इसमें तीनों ही चीजें विरोधाभासी हैं। उस पर जीरा ? जीरा ही क्यों लिया? इसमें सस्पेंस है। मेथी, धनिया हींग कुछ भी ले सकते थे। किन्तु इसमें फ्लो नहीं है। जीरा में तुकांत फिट बैठती है।
यह समय तुकांत का है। आखिरी का अक्षर मिलना चाहिए। फ्लो आ जाता है। अब आखिरी का ही सारा खेल है। राजीव गांधी ने कहा था..आखिरी व्यक्ति के पास एक रुपया भी नहीं पहुंचता। एक रुपए में सरकार चलती है। यह अपनी मुद्रा है। अपनी गुड विल है। एक रुपया दे दोगे तो क्या बचेगा? जीरा। अब कोई सरकार ऊंट और जीरे की बात नहीं करती। महिलाएं अब काफी आगे निकल गई हैं। वह जीरे को भूल गई हैं। सास को भी याद नहीं। जब जीरा ही खत्म हो गया तो ऊंट के मुंह में कौन रखेगा?
आपको पता ही नहीं, जीरा क्या होता है? किस काम आता है? जीरा क्रिकेट की बॉल की तरह होता है। उसी से खेल का मजा है। मज़ा जीरे से नहीं आता। मसलों से आता है। नमक से आता है। आप खाएंगे। तो कहेंगे.. वाह। और है? हम कहेंगे नहीं। यही ऊंट में जीरा है।
हर जगह सिस्टम में कुछ लोग जीरे की तरह होते हैं। एक या दो परसेंट। यह जीरे की तरह परफेक्ट होते हैं। किस ऊंट में कितना जीरा रखना है? रखना है या नहीं रखना? जीरा रखा तो क्या होगा? ऊंट खा लेगा या नहीं? खा लिया तो क्या होगा?
जीरा एक सलाहकार मंडल की तरह है। सलाह हरेक को चाहिए। आपको भी। अफसर को भी। बॉस को भी। सलाहकार मंडल सलाह देता है…आप जब से आए हैं, आपने तो काया ही पलट दी। आपसे पहले वाले कुछ नहीं करते थे। बॉस खुश। जीरा खुश। अफसरों को ये जीरा पुरानी होल्ड फाइल निकाल कर देता है। लाल फाइल हरी फाइल में बदल जाती है। किसी भी शहर में जाइए..ये रंग बिरंगे जीरे आपको हर जगह मिल जाएंगे। ज्वाइनिंग होते ही ये बुके लेकर आयेंगे। फोटो खिंचवाएंगे। अखबारों को देंगे। फिर मेलजोल बढ़ाएंगे। आप गए। जीरा गया। जो नया आयेगा यह उसकी सब्जी में आ जाएंगे।
जीरे की जरूरत हर ऊंट को होती है। वह मुंह चलाता रहता है। जीरे का इंतजार करता है। बिना जीरे के स्वाद कहां ? जीरा और ऊंट एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों की रोजी-रोटी इसी से चल रही है। जीरा यानी सलाहकार मंडल। जनाब यह शिफ्ट में काम करता है। कुछ फुल टाइम जॉब भी करते हैं। आप शुगर बताइए। दवा हाजिर या सलाह हाजिर।
ये जीरे भारतीय समाज की आत्मा हैं। इनके बिना सब रंग फीके। हर व्यंजन बेमजा। इसलिए जीरे को सदा जेब में रखो। क्या पता किस मोड़ पर..किस ऊंट को इसकी जरूरत पड़ जाए। ऊंट को जिस करवट बैठाना हो, उसके मुंह में जीरा डाल दो। सब यही करते हैं। आप भी कीजिए। भैये ! जीरे को छौंक किसको अच्छा नहीं लगता। जरा सा लगाइए। मज़ा ही मज़ा।
काम नहीं बनता हो तो जीरा दीजिए। काम बनता हो तो जीरा दीजिए। बच्चे का दाखिला कराना हो तो जीरा दीजिए। कनेक्शन, सलेक्शन, रिलेशन सब जगह जीरा चलेगा। क्यों कि ऊंट हर जगह हैं। हर ऊंट को जीरा चाहिए।
इति श्री जीरा महात्म्य सम्पूर्णम।
सूर्यकांत
02.07.2025