अगर मैं घास स हूं
।।अगर मैं घास हूं।।
अगर मैं घास हूं
तो प्रकृति के सबसे पास हूं
जल बूंद और ओंस को बदल सकता हूं मोतियों में
मैं ही अन्न उपजता हूं और बदल जाता हूं रोटियों में
प्रकृति की जीवन यात्रा का अभिन्न अंग हूं
जगती की झंझावातों में जीती हुई जंग हूं
प्रकृति के हर थपेड़े में आनंद मनाता हूं
जीवन की जिजिविषा को और जगाता हूं
सो मुझे हक है कि मैं प्रकृति के चप्पे चप्पे को जानूं
जीवन की हर पहेली को देखूं समझूं और पहचानूं
धरती ही क्यों सृष्टि के पांचों तत्वों का करूं विश्लेषण
पा सकूं परम चैतन्य की शक्तियों का कुछ आवेशन
सूखकर भी मैंने प्रथम झोपड़ी को सवांरा था
मैंने ही घर को भीतर और अंदर से बुहारा था
वर्षा के जल को रोक कर अपने में मैंने किया श्रृंगार मिट्टी का
मैं क्या जानूं मुझे पहचानने में क्या दोष था मानव दृष्टि का
क्या मैं समझ सकूंगा क्या चक्र है जीवन का और सृष्टि का
अपना अस्तित्व मिटा कर भी क्या बन सका सबब पुष्टि का
मुझ में नहीं शक्ती है जटिल आत्म विश्लेषण की
बस चाहत उठती है किस प्रेरा से अंत: प्रेरण की
जितना कहना था मैंने उन में से अपनी कुछ बात कही
फिर फुरसत में कुछ बातें करेंगे जो अनेक हैं शेष रही
आओ मुझ पर चलो मैं तुमको भी दूं कुछ नरमाहट
मैंने कांटे नहीं पाले हैं जिससे हो तुमको घबराहट
मेरी अपनी तुमसे बात अब तलक यहीं तक
तुम तो भविष्यभाष हो पहुंचा देना सब तक
स्वरचित प्रेरित रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)