** मैं और बचपन**
** मैं और बचपन**
— सुरेश ‘मुसाफ़िर’
वो मिट्टी की खुशबू, वो कंचों का खेल,
वो बेवजह की हँसी, वो सपनों का मेल।
हर दिन जैसे त्योहार होता था,
बिना किसी वजह के भी प्यार होता था।
मैं और बचपन — अब तो बस यादों के पन्नों में मिलते हैं,
कभी किसी पुराने खिलौने में, कभी माँ की दुआओं में मिलते हैं।
ना चिंता थी कल की, ना पछतावा किसी हार का,
हर आँसू मिटता था बस दादी के एक प्यार भरे फुहार का।
वो स्कूल का बस्ता, वो आधी छुट्टी का इंतज़ार,
वो होमवर्क भूल जाना, और फिर मासूमी से इंकार।
छोटी-छोटी बातों में कितनी बड़ी दुनिया बसती थी,
वो बचपन — हर ग़म पर मुस्कान धरती थी।
अब बड़ा हुआ हूँ, पर अंदर वही बच्चा आज भी है,
जो बारिश में कागज़ की नाव चलाना चाहता है कहीं।
मैं ‘मुसाफ़िर’, वक़्त के इस सफ़र में आगे तो बढ़ा,
पर कहीं पीछे छूट गया — वो मैं, जो सबसे सच्चा था।