जिंदगी
कैसे-कैसे खेल खिलाती है जिंदगी।
राजा को भी रंक बनाती है जिंदगी।।
माँ बाप से एक पुत्र को दूर करती है।
छोड़ दूर जानें को मजबूर करती है।
कभी यह भाई से भाई को छलती है।
कभी विरह में तीव्र पावक सी जलती है।
तरह-तरह के स्वप्न दिखाती है जिंदगी।
राजा को भी रंक बनाती है जिंदगी।।
कभी खुद से ही स्वयं संवाद करती है।
कभी अनजान से व्यर्थ विवाद करती है।
गिरगिट की तरह यह रंग बदलती है।
एक स्थान पर चंचला कभी न टिकती है।
छीन खुशियाँ दिल को दुखाती है जिंदगी।
राजा को भी रंक बनाती है जिंदगी।।
कभी प्रसन्नता से भर देती घर द्वार को।
कभी जालिम बन छीन लेती परिवार को।
कभी जीवन में हर्ष उत्साह भरती है।
कभी विरहन की तरह बस आह भरती है।
कभी तो भूखा ही सुलाती है जिंदगी।
राजा को भी रंक बनाती है जिंदगी।।
कभी अपनों से ही तकरार कराती है।
कभी गैरों से भी यह प्यार कराती है।
कभी तो यह नागिन बन करके डसती है।
और कभी खुद से यह स्वयं पे हँसती है।
रह- रह सबका बैंड बजाती है जिंदगी।
राजा को भी रंक बनाती है जिंदगी।।
जिंदगी के हाँथों हर मनुज लाचार है।
जिंदगी मनुज की साँसों का आधार है।
जिंदगी के लिए करते सब संघर्ष हैं।
कुछ पाते फतेह ,कुछ पाते अपकर्ष हैं।
उमर भर गोल-गोल घुमाती है जिंदगी।
राजा को भी रंक बनाती है जिंदगी।।
स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)