"मन्ज़र-ए-जँग", हिन्दी ग़ज़ल
जँग के हमने, नताइज-ओ-असर देखे हैं,
हमने बर्बादियों के, शामो-सहर देखे हैं।
कैसे कह दूँ कि मुझपे,रब थी मेहरबान नहीं,
बर्ग़-ओ-गुल, के सँग, हमने समर देखे हैं।
भूख और प्यास, से लबरेज़, तड़प-ए-सहरा,
हमने सूखे से, वो निस्तेज, अधर देखे हैं।
कोई बच्चा है इन्तजार मेँ, आएगा पिता,
आते-जाते हुए वो, दिन के पहर देखे हैं।
काश, इन्साँ भी समझ जाए, इल्तेफ़ात कभी,
गाँव वीराँ हैं, तो सुनसान, शहर देखे हैं।
ना अक़ीदा, न ही है सच से वास्ता कोई,
उसकी बातों मेँ तो बस, अगर-मगर देखे हैं।
रोज़ देता हूँ मैं, पैग़ामे-अमन पर फिर भी,
कभी न ख़त्म हो, ऐसे भी सफ़र देखे हैं।
गुफ़्तगू हो भला कैसे, है वेदना मेरी,
सबके नयनों मेँ फ़क़त, ख़ौफ़-ओ-डर देखे हैं।
जँगे-मन्ज़र, ज़हन मेँ अब भी है ताज़ा “आशा”,
सितमगरोँ के वो, ज़ुल्मातो-क़हर देखे हैं..!
नताइज # नतीजे, results
बर्ग़-ओ-गुल # फूल व पत्तियाँ, flowers and leaves
समर # फल, fruits
सहरा # रेगिस्तान, desert
इल्तेफ़ात # दया, अनुग्रह आदि, kindness, courtesy etc
अमन # शान्ति, peace.
वेदना # दर्द, agony