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1 Jul 2025 · 1 min read

दोहा सप्तक. . . . वर्तमान

दोहा सप्तक. . . . वर्तमान

बदल गए हैं आजकल, इस जीवन के अर्थ ।
मौज मनाओ आज बस, बाकी सब है व्यर्थ।।

क्षणिक क्षुधा अवधारणा, बनी आज का मंत्र ।
हर कोई चाहे जिंदगी, जीना मस्त स्वतन्त्र ।।

होने को तो आजकल, धन से सभी समर्थ ।
अर्थ व्यय उपयोग का , पर क्या समझे अर्थ ।।

संस्कारों की धज्जियाँ, उड़ा रहे परिधान ।
तन पर झीना आवरण, नवयुग की पहचान ।।

जीवन की सम्पन्नता, धन से माना आज ।
संस्कारों को किसलिए, भूला आज समाज ।।

मर्यादा का आजकल, उड़ता है उपहास ।
कामुकता का हो रहा, खुलेआम अब रास ।।

पीढ़ी समझे आज की, संस्कारों को व्यर्थ ।
भूल चुकी है आज वह , मर्यादा का अर्थ ।।

सुशील सरना / 1-7-25

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