दोहा सप्तक. . . . वर्तमान
दोहा सप्तक. . . . वर्तमान
बदल गए हैं आजकल, इस जीवन के अर्थ ।
मौज मनाओ आज बस, बाकी सब है व्यर्थ।।
क्षणिक क्षुधा अवधारणा, बनी आज का मंत्र ।
हर कोई चाहे जिंदगी, जीना मस्त स्वतन्त्र ।।
होने को तो आजकल, धन से सभी समर्थ ।
अर्थ व्यय उपयोग का , पर क्या समझे अर्थ ।।
संस्कारों की धज्जियाँ, उड़ा रहे परिधान ।
तन पर झीना आवरण, नवयुग की पहचान ।।
जीवन की सम्पन्नता, धन से माना आज ।
संस्कारों को किसलिए, भूला आज समाज ।।
मर्यादा का आजकल, उड़ता है उपहास ।
कामुकता का हो रहा, खुलेआम अब रास ।।
पीढ़ी समझे आज की, संस्कारों को व्यर्थ ।
भूल चुकी है आज वह , मर्यादा का अर्थ ।।
सुशील सरना / 1-7-25