**मां**
‘मां’ एहसास है एक डोर का, जिसमें बंधा हुआ संसार है।
मां पर क्या लिखूं ? ‘मां’ तो स्वयं मेरी रचनाकार है।।
अच्छी है या बुरी है, ‘मां’ जीवन का आधार है।
‘मां’ की ममता का क्या कहना, वह अपरम्पार है।।
‘मां’ लुटा देती है बच्चों पर, अपना सब कुछ।
मैंने भगवान को तो नहीं देखा,मेरी ‘मां’ साक्षात भगवान है।।
ले लेती है बलाएं सर पर,गुजर जाती है भयानक खतरों से।
‘मां’ वह दातार है,
जितना लिखूं’मां’पर कम है,’मां’सागर नहीं महासागर है।।
क्या दे पाते हैं हम ‘मां’ को बदले में?
हम सबको करना इस पर विचार है।।
‘मां’ वह दीपक है,जो तूफानों में फैलाता प्रकाश है।
‘मां’ पर क्या लिखूं,’मां’ तो स्वयं मेरी रचनाकार है।।
स्वरचित रचना ओमवती ‘यादकेत’
अमरोहा (उ०प्र०)