तेल की बूंद
तेल की बूँद
सागर को घमंड था
कि वह पुराना है,
गहरा है,
इतिहास जैसा
और सब कुछ डुबो सकता है।
वह लहरों में बैठकर हुक्म देता था
“जो बोले, उसे बहा दो।
जो सवाल करे, उसे डुबो दो।
जो चुप रहे — उसे अपनी लहर में रंग दो,
ताकि वह मेरे जैसा लगे।”
उसके भीतर
सच ने कई बार साँस लेने की कोशिश की थी
पर लहरें
हर बार झूठ का बुलबुला बनकर ऊपर आ जातीं।
सागर सोचता था
“मैं राष्ट्र हूँ, मैं व्यवस्था हूँ,
मैं इतना बड़ा हूँ कि
जो मुझसे अलग हो, वो देशद्रोही है।”
फिर
एक तेल की बूँद आई।
ना भाषण,
ना तख्ती,
ना नारा,
ना प्रचार।
बस, एक सलीके से जिया गया सच।
वह बूँद किसी किताब से नहीं निकली थी,
ना किसी पार्टी की सदस्यता से,
ना ही किसी स्टूडियो की बहस से।
वह बूँद थी —
एक किसान के माथे की पसीने की,
या एक छात्र की आँखों में बचे आख़िरी सपने की।
वह बूँद
लहरों पर तैरती गई
सागर चौंका, गड़बड़ाया, गरजा
“मैं हूँ सागर —
तेरी औक़ात क्या?”
बूँद मुस्कराई,
बिना शोर किए कहा
“तेरे भीतर जितनी गहराई है,
मेरे भीतर उतनी सतह की स्पष्टता।”
सागर ने पूरी ताक़त से कोशिश की
हुक्म निकले,
धमकियाँ आईं,
सोशल मीडिया की आँधी उठी,
विपक्ष को बिकाऊ कहा गया,
पत्रकारों को देशद्रोही।
पर वह तेल की बूँद
तैरती रही —
ऊपर, बेख़ौफ़, बेआवाज़।
क्योंकि वह अकेली नहीं थी।
अब हर बूँद
अपने भीतर साहस लिए हुए थी।
छोटे-छोटे हाथ
अब सवाल बन गए थे,
और लहरों से नहीं डरते थे।
अब बूँदें
आपस में मिलने लगीं
एक लहर बनी,
जो सागर के घमंड पर चढ़ बैठी।
सागर अब भी वहीं है
पर अब
वह जान गया है,
कि हर बूँद डूबने नहीं आई।
कुछ बूँदें
सच की तरह होती हैं
हल्की, शांत,
पर अडिग।
-*देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’*