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1 Jul 2025 · 2 min read

लोकतंत्र के मच्छर

लोकतंत्र के मच्छर

बारिश की पहली बूँद क्या गिरी,
मच्छरों ने घोषणा कर दी-
अब हमारा शासन शुरू !

गली, मोहल्ला, छत,
चाय की दुकान
हर जगह झुंड में उतरे,
भिनभिनाते हुए,
जैसे चुनावी रोड शो हो।

कान के पास मंडराए
बिलकुल उस टीवी एंकर की तरह,
जो चिल्ला कर पूछता है —
बोलो ! राष्ट्र के साथ हो या नहीं ?

कुछ मच्छर तो सरकारी प्रवक्ता हैं —
काटते नहीं,
बस दिन भर आपकी समझ पर सवाल करते हैं।

रात को बिन बुलाए आते हैं
और सुबह WhatsApp पर मैसेज भेजते हैं —
“डेंगू एक अफवाह है,
असल में ये ‘राष्ट्रीय सफाई अभियान’ है!”
नगरपालिका कहती है —
“हमने धुआँ छोड़ दिया!”
लेकिन मच्छर हँसते हैं —
“हमें धुएँ में चुनावी वादे दिखते हैं!”
जनता पूछती है —
“कब तक ये काटेंगे?”
तो मंत्री मुस्कराकर कहते हैं —
“मच्छर भी भारत के नागरिक हैं,
हम उन्हें नाराज़ नहीं कर सकते।”
कुछ मच्छर घोषणापत्र पर पलते हैं,
हर पाँच साल में नए नारे काटते हैं।
पीठ पर लहराते हैं झंडे,
और हर काट के बाद कहते हैं —
“ये विकास की सुई है!”

फिर एक रात
एक मच्छर पहुँच गया VIP इलाके में
सीधे मंत्री जी की नाक पर।
काट लिया —
गौरव, गरिमा,
और सरकारी सुविधा के बीच।
अगले ही दिन
प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई
“यह मच्छर विदेशी एजेंडे का हिस्सा था!”
“यह सिर्फ मच्छर नहीं था —
यह जैविक युद्ध था लोकतंत्र के ख़िलाफ़!”

अब हर गली में
मच्छर-संदिग्ध खोजे जा रहे हैं।
जनता से कहा गया —
“अगर कोई आपको कान के पास भिनभिनाता दिखे,
तो तुरंत 112 पर कॉल करें।”
“मच्छर-विरोधी ऐप” लॉन्च हुआ,
नाम: “Bhinn-Bhinn Tracker 2.0”
और नियम बनाए गए
“हर मच्छर को काटने से पहले OTP लेना होगा।”
टीवी पर बहस हुई —
“क्या यह मच्छर विपक्षी विचारधारा से जुड़ा था?”
और स्क्रीन पर लिखा था:
“#MosquitoJihad”

अब जो भी खुजाता है,
उससे पूछा जाता है —
“तुम्हें खुजली क्यों हुई?”
“क्या तुम किसी टूलकिट से जुड़े हो?”
अंततः:
जब मच्छर जनता को काटते हैं,
तो कहा जाता है —
“ये तो आदत है, सहन करो,
ये देश के विकास की प्रक्रिया है।”
लेकिन जब मच्छर सत्ता को काटता है,
तो रातों-रात योजना बनती है,
बजट पास होता है,
और जनता से कहा जाता है —
“अब और काटा,
तो तुम भी मच्छर हो!”
और इस तरह —
मच्छर, लोकतंत्र से बड़े हो गए।
अब वे चुनाव नहीं लड़ते,
वो बस हर चेहरे को खुजला कर पूछते हैं —
भिनभिन की आवाज़ सुनी?
तो तय करो —
तुम नागरिक हो या राष्ट्रद्रोही?”

-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

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