गुरु पूर्णिमा
गुरु स्वयं पूरण हरी,हरता तीनों ताप।
गुरु ही पूरण मां है,गुरु ही पूरण बाप।
पूर्ण गुरु न मिला यदि,समझो पन बर्बाद।
चौबीस घंटे सात दिन,रखो गुरु को याद।
धर्मराज से शिष्य का,ले लेता है लेख।
बुरे कर्म में सतगुरू,गाड़ देत है मेख।
अनहद नाद सुनाए के,अंदर करे प्रकाश।
चौरासी चक्कर मिटे,होय रामघर वास।
कबिरा डंका पीट कर,जोर जोर से गाता।
लाखों दाता जगत में,पर गुर समान नहीं दाता।
गुरू पुर्णिमा सुन सृजन,एक ही दिन न मनाओ।
रोज रहो सतगुर शरण,रोज गुरू गुण गाओ।