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30 Jun 2025 · 1 min read

*श्रद्धा सुमन*

देकर संविधान बाबा अमर हो गए,
छोड़कर तड़पता हमको कहां खो गए।
ढूंढू कहां आपको कोई न बताता है,
गरीबों को तो बाबा हर कोई सताना ही चाहता है।
है क्या शक्ति हममें यह कोई नहीं जानता,
न जाने विवेक इनके कहां खो गए।।
देकर————

शैतान बने हैं खुद जो मिनी संविधान क्या बनाएंगे,
हर कदम पर झूठ बोले जो देश क्या बचाएंगे।
खोखला किया देश को सब कुछ डकार गए,
उन्हें क्या पड़ता है फर्क चाहे कितनी मां के लाल गए।
घोटाले करके सभी अनजान हो गए।।
देकर —————

जरूरत है देश को फिर से कोई भीम ‘अवतार’ ले,
डूबते सूरज को जो पश्चिम से निकाल दे।
भंवर में फंसी है नैया फिर से उछाल दे,
बाबा भीम जैसा कोई धरती मां लाल दे,
निस्वार्थ होकर जो देश पर कुर्बान हो गए।।
देकर—————–

पक्ष करना छोड़ो अब तो आंखें खोल लो,
निजीकरण सबका हुआ कुछ भी नहीं बचा हुआ।
थाली से सब कुछ गायब हुआ,
सरकारी भी अब तो न सरकारी रह गए।
अरमान सब अब आंसुओं में बह गए ।।
देकर ——————

स्वरचित रचना ओमवती ‘यादकेत’
अमरोहा (उ०प्र०)

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