*"हरियाली की चादर"*
वर्षा ऋतु के आते ही, धरा हर्ष से मुस्काई,
बूँदों की मधुर रुनझुन से, जग में रौनक है छाई।
अंबर ने भेजे है सन्देशे, काले घन है बन आए,
बिजली की मुस्कान लिए, गर्जन की लोरी अब ये है गाए।
धरती ने ओढ़ी हरियाली, नव वस्त्रों की हो जैसे छाया,
प्रकृति नाच उठी उल्लास में, जैसे कोई पर्व मनाया।
नदियाँ गा रही सरगम, तालों में नर्तन होता,
किसान के चेहरे पर अब, आशा का दीपक संजोता।
कलियाँ मुस्कातीं शाखों पर, मोर मयूरा नाचे,
बच्चे कागज़ की नाव लिए, भीगें जल में साचे।
वृक्ष झूमते पवन संग, धरती करती वंदन,
शीतल बयारें लहराए, मिटे मन का क्रंदन।
हे ऋतुराज वर्षा! तुमसे, जीवन नव सृजन पाता,
तुम हो धरती की मुस्कान, जो हर कण में है समाता।