दीदार ...
दीदार …
हो जाता है प्यार
होती जब हैं
आँखें चार
जीना हो दुश्वार
जब यादों की
चले बयार
पावस रुत आ जाती जब
होती आँखें चार
नैना करते सपनों का
पलकों में शृंगार
जब अंतर्मन की
प्रीत उपवन में
होती आँखें चार
अन्तःपटल पर
कलित हुआ जो
वो मेरा स्वीकार
बार बार में रब से चाहूँ
हो उसका दीदार
हो श्वास वो मेरी आखिरी
जब न हो दीदार
बार बार हों
मेरे प्रीतम से
मेरी आँखें चार
सुशील सरना