जीवन प्रगति का योग सधा है
///जीवन प्रगति का योग सधा है///
सत्य पूर्ण है शांति पूर्णता,
पूर्णता में मधुता राशि अनंत।
जब तक पूर्णोन्मुख ना होंगे,
जीवन रस क्या खोजेंगे कंत।।
जहां सत्य नहीं वहां शांति कहां,
जहां पूर्णता हो वहां भ्रांति कहां।
चलो करें आज शांति अन्वेषण,
मधु सुधा मय रहता संसार जहां।।
अगर शांति सत्य न्याय सब,
पृथक पृथक होते अस्तित्वमान।
तब सत्य वहां अशांति संभव,
शांति हो वहां असत्य का मान।।
पूर्णता में सत्य मधुता न्याय शांति।
इस तथ्य में नहीं कभी कोई भ्रांति।।
शांति में मधुरता की सरस धार।
जीवन पाता सुख संतोष अपार।।
जहां शांति हीनता मधुता हीनता,
तो निश्चित ही वह होगा श्री हीन।
जहां असत्य सरोकार दिखाई देते,
त्यागो उनको वे सब कुटिल तुहीन।।
प्रकृति में पूर्णता का हो संशोधन,
जग में उन घटनाओं का आलोड़न।
जब घटनाएं हमारे सम्मुख आती हैं,
शांति सत्य और न्याय का संबोधन।।
इन का पृथक पृथक अस्तित्व नहीं,
सत्य राह पर शांति न्याय संग मधुता।
समरसता हो सर्वत्र जन जीवन में,
अस्तित्वहीन होगी जग की कटुता।।
जब पूर्णता होती सब भांति पूरी,
शांति भरा सत्य सधा जग होगा।
न्याय प्रेम वहां नहीं अन्याय द्वेष ,
तो क्यों कटुता भरा जीवन होगा।।
सत्य न्याय शांति सदा ही सर्व हित,
इसमें मधु जीवन का रहस्य भरा है।
जीवन से सब विकार निष्कासित हों,
तब जीवन प्रगति का योग सधा है ।।
स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)