मेरे गुरुवर, शिल्पकार हो तुम....!
” हे मंगल मूरत…
मेरे कुंभकार हो तुम…!
मैं मिट्टी का टुकड़ा…
जिसे एक अनुपम दिया आकार…!
हे मंगल मूरत…
मेरे शिल्पकार हो तुम…!
ज्ञान के पथ पर हम नया-नए थे…
शून्य भाव का पात्र बन, यूं ही तिरस्कृत पड़े थे…!
जो पथ बहुत कठिन था…
ओ पथ, तुमने ही अति सरल किए थे…!
न जाने कौन भंवर में फंसे पड़े थे…
बनकर हम लाचार…!
लांघ अरण्य अब खड़ा सु-पथ…
ओ सब तेरा ही चमत्कार है…!
स्व-आश्रित जीने की कला, तेरा ही उपहार है…!
मूढ़ गरीब, कोई भी आए…
सदा खुला पड़ा होता है तेरा द्वार…!
है वो चमत्कार तेरे ज्ञान का…
जो एकलव्य तुच्छ हो, बन धनुर्धर…
कर गए अदृश्य लक्ष्य पर प्रहार…! ”
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