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29 Jun 2025 · 1 min read

खूबसूरत यादों को संजोए हुए....!

खूबसूरत यादों को संजोए हुए….!
” ये मेरा गांव है साहब…
बांहें फैलाये, प्रतीक्षारत…
कुछ यादों को संजोए हुए…!
कल-कल बहती जल धारा…
और ये मनोरम दृश्य…
मेरे व्यक्तित्व को, अपने साथ पिरोए हुए…!
मेरे बीते बचपन को संजोए हुए…
मेरे रीतेपन के साथ जागते हुए…!
मेरे सुख-दुख को समेटे…
अविचल खड़ा रहता है,
यहां की अनेक ये यादें…!
मैं यहां नहीं बसती…
अभिमान यहां नहीं ठहरती…!
यहां बसता मेरा मन…
उन्मुक्त विचरता तन…!
इसकी गलियों की गोद में…
होता है मुझे, मेरे होने का बोध…
जुड़ा है मेरा अस्तित्व यहां की मिट्टी में…!
जाना है यहां मैंने, प्रेम का मर्म…
दिखया है इसने कृष्ण प्रेम रंग का सर्ग…!
हर पल, हर क्षण…
समाये अपने अंदर, रिश्तों की मधुर सुगंध…!
यारों की निश्छल राग और अपनापन…
मेरे खुबसूरत यादों को…
अपने आप में संजोए हुए…!
ये अमर चित्र, वर्तमान में…
अतीत को ढूंढता, यह मन बावरा…
अबोध विचित्र….!
ये मेरा गांव है साहब…!
कुछ यादों को संजोए हुए…!! ”

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