ऐ ज़िन्दगी....!
” ऐ ज़िन्दगी…
ज़रा आहिस्ता चल…!
चल मगर…
ज़रा ठहरता चल…!
कुछ तेज है, रफ़्तार तेरे…
मैं संभल नहीं पाता हूँ…!
रफ़्तार में तेरे, चलने से…
कुछ रुठ गए और कुछ छूट गए…!
कुछ जुड़ते जुड़ते टूट गए…
कुछ रिश्ते बनके टूट गए…!
हो सकता है…
अभी मुझमें, कुछ समझ नहीं…!
वर्तमान तौर-तरीके का…
कुछ अंदाज़ नहीं…!
कभी हकीकत से…
परे हो जाता हूँ मैं…!
कभी नादानी वश या भूलवश…
आधुनिकता में शामिल नहीं हो पाता हूँ मैं…!
शायद ये भी…
जिंदगी के, कुछ हिस्से हैं…!
मगर ऐ जिन्दगी…
यहां, कुछ अरमान है मेरे..
मानवता के नाते…!
कुछ कर्ज़ निभाना बाकी है…
कुछ फ़र्ज़ निभाना बाकी है….!
ऐ ज़िन्दगी…
मैं तूझसे नाराज़ हूँ,
मगर परेशान नहीं…!
तेरे साथ बग़ैर…
चलना मुश्किल है,
तू चल, ज़रा आहिस्ता चल…!! ”
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