*वियोग की वेदना*
संध्या की साँझ में तन्हा हूँ बैठा,
स्मृतियाँ तेरी ही हर दिशा में फैली हैं।
हवा की सरगम में तेरा स्वर सुनूँ,
मौन की भाषा भी अब बोलने लगी है।
जहाँ तेरे कदम पड़े थे कभी,
वहाँ आज पगचिह्न भी बिछुड़ गए हैं।
तेरे श्वास की वह मधुर गूंज,
अब केवल हृदय की गूँज बन रह गई है।
तू थी तो जीवन में बहार थी,
अब तो ऋतुएँ भी शोक में डूबी हैं।
तेरे बिना यह चाँद भी फीका लगे,
और तारों की छाया भी अधूरी सी लगे।
वियोग की यह अग्नि न जला पाए मुझे,
पर तेरे बिना यह जीवन मुझे अधूरा ही लगे।
न रोता हूँ अब, न हँस पाता हूँ मैं,
सिर्फ़ तेरी यादों के दीप जलाता हूँ मै।
हे प्रिय! तू दूर सही, पर हृदय में समाई है,
तेरे बिना तुझमें ही जीवन की मैने छाया पाई है।
जब तक श्वास चले, तेरा नाम गुनगुनाऊँ मैं,
वियोग में भी तुझसे ही अपना प्रेम निभाऊँ मैं।