अंधेपन का दौर देखिए,
अंधेपन का दौर देखिए,
बदली सबकी चाल ।
देख-देख करते अनदेखा,
किसे कहूँ यह हाल ?
अपराधों की सेज सजी है,
हर लोभी मन के आँगन में ।
वसुधा प्यासी तड़प रही है,
बरसातों के इस सावन में ।
ठूँठ हो गए वृक्ष सभी अब,
टूट गई हर डाल ।।
✍️ अरविन्द त्रिवेदी