दोहा सप्तक. . . . . विश्वास
दोहा सप्तक. . . . . विश्वास
नहीं खोलना गैर से, अपने मन की बात ।
अपना बन कर वह हमें ,दे सकता आघात ।।
सोच समझ कर कीजिए, जग वालों से बात ।
अपनेपन की आड़ में, ये देते आघात ।।
परिधानों से सभ्य जो, लगते हैं इंसान ।
अक्सर होते हैं वही, धोखों के दीवान ।।
कितनी परतों का बना, जाने यह इंसान ।
विश्वासों की नींव पर, झूठा बने महान ।।
वर्तमान हालात में, मुश्किल है विश्वास ।
विश्वासों की आड़ में, मिलता है संत्रास ।।
सत्य भेस में आजकल, झूठ भरे परवाज ।
अपनों से ही छुपा रहे, अब अपना हर राज ।।
हाथ मिलाकर हाथ में, बनते सच्चे मीत ।
स्वार्थ सिद्धि के बाद फिर, बनती प्रीति अतीत ।।
सुशील सरना / 28-6-25