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28 Jun 2025 · 2 min read

'रथ पर सवार प्रेम का देवता"

“रथ पर सवार प्रेम का
!!!देवता!!!
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ओड़िशा के पुरी नगर में एक भव्य और अद्भुत उत्सव हर वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है – जगन्नाथ यात्रा। यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा और भक्ति की जीवंत झलक है।

बहुत समय पहले की बात है। भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में धरती पर अवतार लिया। जब श्रीकृष्ण ने लीला समाप्त कर गोलोक को प्रस्थान किया, तो उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा अत्यंत दुखी हो गए। उनका प्रेम श्रीकृष्ण के लिए इतना गहरा था कि वे हर पल उन्हें याद करते रहते।
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एक दिन, पुरी के राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न आया – “समुद्र तट पर एक लकड़ी का बड़ा लठ्ठा तैरता हुआ आएगा, उसी से मेरे विग्रह को बनवाओ।” राजा ने वैसा ही किया। तभी एक रहस्यमय वृद्ध बढ़ई (स्वयं भगवान विष्णु) आया और कहा – “मैं मंदिर के गर्भगृह में मूर्तियां बनाऊंगा, पर दरवाज़ा कोई नहीं खोलेगा।”

राजा ने वचन दिया। कई दिन बीत गए। वृद्ध भीतर से कोई आवाज़ नहीं दे रहा था। चिंतित होकर रानी ने दरवाज़ा खोलवा दिया। अंदर भगवान की अधूरी मूर्तियाँ थीं – बिना हाथ-पैर के। राजा दुखी हुआ, पर तभी आकाशवाणी हुई – “हे राजन! यही मेरी लीला है। मैं अपूर्ण होकर भी भक्तों के लिए पूर्ण हूँ।”

तब से वही मूर्तियाँ – भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा – पुरी में विराजमान हैं।

रथ यात्रा की परंपरा
हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को ये तीनों भाई-बहन गुंडिचा मंदिर जाते हैं – जो उनकी मौसी का घर माना जाता है। विशाल रथ बनते हैं।

भगवान जगन्नाथ का रथ – नंदीघोष, 16 चक्के
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बलभद्र का रथ – तालध्वज, 14 चक्के
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सुभद्रा का रथ – दर्पदलन, 12 चक्के
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लाखों भक्त इन रथों को खींचते हैं। यह खिंचाव केवल रस्सियों का नहीं, यह खिंचाव है भक्ति, प्रेम और आस्था का।

💐💐 संदेश💐💐

यह यात्रा हमें सिखाती है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आकर उनके प्रेम को स्वीकार करते हैं, चाहे वो अमीर हो या गरीब। भगवान जगन्नाथ का यह रूप – बिना हाथ-पैर के – हमें यह भी सिखाता है कि शारीरिक नहीं, आत्मिक प्रेम ही सबसे बड़ा है।
जगन्नाथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, यह एक आंतरिक यात्रा है । स्वयं से ईश्वर की ओर।
*इसमें समर्पण है, सेवा
है और सबसे ऊपर – प्रेम है।*
🌹 जय जगन्नाथ🌹
डॉ मनोरमा चौहान
हरदा (मध्य प्रदेश)

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