आदमी की सोच जैसी होती है, सब कुछ उसे वैसा ही दिखायी देता है,
आदमी की सोच जैसी होती है, सब कुछ उसे वैसा ही दिखायी देता है, पूरी दुनिया उसे वैसी ही दिखती है, पूरा जीवन वह वैसे ही जीता है…
कुछ लोग कहते हैं-
जीवन दुःख है, जीवन माया है, परन्तु ये धर्म नहीं कहता है, यह वो लोग कहते हैं जिन्होने जीवन को आनन्द से जीने की सोच खो दी है, जो लोग बीमार मन रख कर जीते हैं…
धर्म जीवन मे दुःख नहीं देता, धर्म कुछ छोड़ने के लिये हमसे नहीं कहता, धर्म तो सम्पूर्ण विज्ञान को समाहित कर हमें जीना सिखाता है, धर्म परम आनन्द मय जीवन की दिशा है…
किन्तु कुछ बीमार मन के लोगों ने अपने स्वार्थ के लिये आदमी के मन मे धर्म का डर बैठा दिया है- तुम ऐसा करो, तुम वैसा करो, नहीं तो भगवान नाराज हो जायेंगे और तुम्हें मरने के बाद स्वर्ग नहीं मिलेगा…
सच कहूं तो–
“धर्म को आनन्द भाव से जीना चाहिए, दुःख या त्याग भाव से नहीं”
हर पल को आनन्द से जीने से ही हमें जीवन का सौंदर्य, जीवन का सत्य और जीवन का शिवत्व मिल सकता है…
इसलिए यदि हम वास्तव में धर्म का पालन करना चाहते हैं तो हमें दुख में रहना भूल जाना चाहिए और हर पल को आनंद से जीना चाहिए
सुनील पुष्करणा